आत्महत्या यानि स्वयं की हत्या या दूसरे शब्दों मैं कहे तो खुद्खिशी ये नाम हैं उस परेशानी समस्या का जो कुछ ना कहते हुए भी बहुत कुछ बयां कर जाती हैं ये सिलसिला सालो से चला आ रहा है जब आये दिन देखते है कि लोग आत्महत्या की कोशिश करते है और उसमे कामयाब होते नजर आते है / समाचार चैनलों , अखबारों आप प्रतिदिन कई लोगो को आत्महत्या का शिकार पाते है क्या कमी है हमारे परवरिश में ,संस्कारो में की आज इस कदर लोग अपने जानो को अपना मानकर किसी की परवाह के बगैर स्वयं की इच्छा से इस वारदात को अंजाम देते हैं। क्या ज़िन्दगी का मूल्य इन लोगो के सामने इतना हैं की इसे खत्म कर देना ही समस्याओ का समाधान हैं। बात चाहे शहरो की हो या ग्रामीण इलाको की कभी ;हालात तो कभी मानसिकता आपको ये अपराध करवा देती है। क्या आपकी जान सिर्फ आपकी है क्या ये सवाल आपको परेसान नहीं करता कि हमारा जीवन हमारा नहीं तो इस ज़िन्दगी का हक़ भी हम स्वयं को क्यों दे इसे बनाने और मिटाने वाला कोई और है। क्या ये अनमोल ज़िंदगी हमें इस तरह बर्बाद करने को मिली है। क्या ये मानसिक विकृति हमें इंसान से मुर्ख इंसान बना देती है जो कुछ सोचे समझे बिना अपनी जान को समाप्त कर लेते है / आज समाज मै पढने लिखने वाले शादी -शुदा औरते,प्रेमी -प्रेमिका। अक्सर ये कदम उठाते है /
आपने कई बार सुना होगा परीक्षाः में अच्छे अंको से उत्तीर्ण ना होने पर या यू कहे की माँ - बाप शिक्षक दोस्तों के बीच शर्मसार होने का भय एक बालक को ये दुष्कार्य करने के लिए प्रेरित करता है / उसकी मानसिक स्थिति आसपास के माहौल से बनती है दिमाग में ये नम्बरो का चक् घुमाने के कार्य की शुरुआत सर्वप्रथम घर से ही होती है एक बालक की परवरिश प्यार व अपनेपन से होती है और उसका यही खालीपन उसके मौत का कारण बनता है/ एक प्रेमी प्रेम में धोखा खाकर इतना टूट जाता है की उसे अपनी ज़िन्दगी खत्म करने के आलावा दूसरा कोई रास्ता नही मिलता / क्या ये ६ महीने, १ साल , ५ साल ,का प्यार इनके जीवन में इतना महत्वपूर्ण जाता है की ये अपने २० २२ साल से साथ रहने वाले अत्यधिक प्रेम करने वाले माता- पिता को भूल जाते है क्या वो प्यार प्यार है जो आपको बीच रास्ते में छोड़ दे / आप क्यों क्ही सोचते की ज़िन्दगी अनमोल है यह सिर्फ एक बार मिलती है इसलिए इसे अमूल्य समझेऔर और इसे समाप्त न करके ऐसा कुछ कर जाये की लोग हमे कायर या बुजदिल नही बल्कि जिंदादिली और खुश मिजाज इन्शान समझे / हमारे समाज में लड़कियों की सोच शुरू से ही ऐसी बनाई जाती है उन्हें हमेशा त्याग और बलिदान देना पड़ेगा विवाह के बाद चाहे जितने भी कष्ट झेले , दहेज़ के लिए प्रतिदिन प्रताड़ित की जाय , मार पीट का शिकार बन जाय ;फिर भी सब चुपचाप सहन करती है अंदर ही अंदर घुटती है /मुह से कुछ नहीं कह पाती है इसका कारण है हमारा समाज की गन्दी पुरानी सोच जहाँ पर लड़की के विषय में कहा जाता है की अगर तुम्हारी डोली उठेगी तो दोबारा तुहारी अर्थी ही वापस आएगी इसी कारण लड़कियों के मन में सवाल होते है की अगर मैंने सवाल उठाया तो समाज क्या कहेगा मेरे माँ बाप की इज्जत का क्या होगा यही सब बाते सोच कर लड़की की यही मानसिक विडम्बना है जो उन्हें खुदखुशी करने के लिए प्रेरित करती है हमें ध्यान देना होगा इन विषयो पर अपने सोच में परिवर्तन लाना होगा ताकि कोई भी मनुष्य ऐसा न करे। /